ममता बनर्जी क्यों खफ़ा है नरेंद्र मोदी से? किस वजह से वह अलग हुई थी भाजपाई नेतृत्व वाली NDA सरकार से?

आजकल नरेंद्र मोदी के विरोधियों से मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने की फिराक में घूम रही ममता बनर्जी कभी NDA का अभिन्न हिस्सा रही थी।

ममता बनर्जी को तीसरे मोर्चे के गठन के लिए सारी प्रादेशिक पार्टियों से बराबर सहयोग मिलता दिखाई दे रहा है।
ममता बनर्जी ने तिसरे मोर्चे के गठन की अगुवाई लेते हुए सारी प्रादेशिक पार्टियों को एकजुट करने का अभियान पुरजोर अपने हाथों में लिया है।

तीसरे मोर्चे के गठन की तैयारियां जोरों पर है। ममता बनर्जी सारे राज्यों की प्रादेशिक पार्टियों को एकजुट करने में जी जान से लगी हुई है। जिसमें उनको हाल ही में NDA से अलग हुए चंद्रबाबू नायडू एवं तेलंगाना के YSR कांग्रेस के लीडरान समेत अखिलेश एवं मायावती भी बराबर साथ देते दिखाई दे रहे हैं।

क्या ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल से निकलकर दिल्ली पर राज्य करने की महत्वाकांक्षा लिए हुए हैं!

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस कोई बहुत अच्छा विकास कर रही है ऐसा कहना उचित नहीं होगा। उनके अपने राज्य में उनपर साम्प्रदायिक तुष्टीकरण करने के आरोप बराबर लगते रहे हैं। कई मामलों में उन्हें अदालतों से भी फटकार मिली है। ग़रीबी औऱ बेरोजगारी पश्चिम बंगाल में भी चरम पर है।

ऐसे में तीसरे मोर्चे का गठन, जिसमें जुड़ने की हर प्रादेशिक पार्टी के मुखिया कि अपनी वजह, औऱ अपनी जरूरत हो सकती है। उन सभी प्रादेशिक लीडरान को अपने प्रदेश से उठकर देश राष्ट्रीय फ़लक पर अपनी काबिलियत दिखाने की भरसक चाह होना लाजमी है।

ऐसे में किसी एक नेता की पहल पर सब लोग एकसाथ आ तो सकते हैं, लेकिन एक साथ बने रहना, लंबे अरसे तक, शायद असंभव है। नहीं तो पहले भी तीसरे मोर्चे बन कर अपनी सरकार गठन कर चुके हैं। औऱ ये सरकारें कितने छोटे कार्यकाल में धराशायी हो गई थी, ये भी सारा देश जानता है।

ममता बनर्जी यह सब जानते हुए भी क्यों आशावादी है, की वह सबको एकसाथ जुटा लेंगी?

हाल ही में NDA से अलग हुए चंद्रबाबू नायडू औऱ कबसे नरेंद्र मोदी के पीछे लगी शिवसेना एवं YSR कांग्रेस समेत शरद यादव, लालूप्रसाद यादव, अखिलेश यादव एवं मायावती से उन्हें तगड़ा सहारा मिलते दिख, उनका हौसला औऱ बुलंद हो चला है।

CJI पर महाभियोग प्रस्ताव पारित करने की पहल में भी उन्होंने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया है। कुछ अरसे पहले, सुप्रीम कोर्ट के चार जजों कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था। इस मामले को भी ममता बनर्जी ने बड़ी गंभीर बात बताते हुए, अपने घोर विरोधी वामपंथियों के CJI पर संसद में महाभियोग चलाने के प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन किया है।

जिससे एक बात बराबर तय है, की उन्हें राष्ट्रीय पटल पर आने के लिए किसी का भी सहयोग मंजूर होगा। चाहे वो भ्रष्टाचार के आरोपों में क़ैद में चल रहे लालूप्रसाद यादव, या उनके प्रखर विरोधी वामपंथी ही क्यों न हो। हालांकि सही भी है कि राजनीति में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी कैसे तीसरे मोर्चे के गठन में सफल होती हैं। औऱ तीसरे मोर्चे के सर्वोच्च लीडर के रूप में वह औऱ दलों को कितनी स्वीकार्य होंगी। एवं इस सब घटनाक्रम में कांग्रेस का क्या स्थान होगा, कांग्रेस कहीं अलग थलग तो नहीं कर दी जाएगी, यह तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा।

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