जूली से मॉम तक

बचपन से पचपन तक जलवा बिखेरती रही औऱ आख़री मंज़िल तक चर्चित रही सदाबहार अदाकारा श्रीदेवी। उनकी पहली हिंदी फिल्म जुली में डरी सहमी सी दिखने वाली श्रीदेवी, अपनी आखिरी फ़िल्म मॉम में अपनी बेटी के गुनाहगारों को शेरनी की तरह झपटके मारने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाई। जूली से मॉम तक के उनके सफ़रमें हम भी उनकी फिल्मों को देखते, सराहते हुए हमसफ़र बने रहे।

बचपन में उनकी फ़िल्म जूली देखने के बाद, जो फ़िल्म उनकी देखी वो थी हिम्मतवाला। मज़ा आया था, क़सम से। उसके बाद तो उनकी औऱ जितेन्द्र की जोड़ीने जो धमाल मचाई थी, मवाली, जस्टिस चौधरी, तोहफा, मास्टरजी, ऐसी कई फिल्में, जिन्होंने, राजेश खन्ना से लेकर अमज़द ख़ान, कादर खान से लेकर असरानी औऱ शक्ति कपूर तक को नया मौका औऱ ख़ूब शोहरत दिलवाई।

श्रीदेवी के बॉलिवुड में आने से औऱ सफ़ल होने से, जया प्रदा, माधवी, औऱ न जाने कितनी दक्षीण भारतीय फ़िल्मों की नायिकाओं को मुंबई में नए मौके मिले। श्रीदेवी लेकिन इन सबसे जुदा थी। वो अपने आप में एक करिश्मा थी। सदमा फ़िल्म ने उनके अभिनय को एक नया आयाम दिया। उनके अचीवमेंट की हैम क्या चर्चा करेंगे। एक आदमी सिनेमा हॉल की सीट से जैसे आकलन करता है, हम वैसे ही उनके काम को अपने नजरिए से बता रहे हैं। उनकी जो फिल्में हमें सबसे ज़्यादा टच कर गई, वो थी इंग्लिश विंग्लिश औऱ हाल ही में देखी मॉम।

पिंक फ़िल्म में अमिताभ बच्चन की अदाकारी को देखकर लगा जैसे यह किरदार तो सिर्फ अमिताभ ही निभा सकते हैं। वैसे ही जब मॉम फ़िल्म में औऱ कोई नायिका श्रीदेवी के क़रीब भी नहीं फटक सकती थी। हमारी खुशनसीबी है कि हम उस दौर में पल बढ़ रहे थे जिस दौर में श्रीदेवी फिल्में कर रही थी।

Mr India को नहीं देख पाने का भ्रम हमें कराने वाली श्रीदेवी अब हमें नहीं दिखने वाली। जितनी चकाचौंध भरी जिंदगी वो जी गई, उतनी ही रोशन उनकी रूह भी रहे। जहां भी हो, सुकून पाए ऐसी दुआ करें।

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